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Rang Rasiya poem (valentine week)

रंग-रसियाँ रंग में रस की महक है जैसे रस में मिला गुलाब है जैसे बेसुरा सा हूँ मैं तूम बंदिश सी हो गलत स्वर सा भिखर जाता हूँ तू मिलकर सरगम बन जाती हो आकल से सारंग हो जाती है स्मृति तुम्हारी हर रंग में आती है लाल-लाल सी होली है मलाल न होगा कोई कभी खटपटा सी जाती हो जैसे कोई नारंगी होई निकाह का जश्न है करदो हाथ पीले हल्दी रच गई है सुनेहरे से दिल की तेरे गुमसुम से पतझड़ में हरे- पन की डोली आई आई आई आई ओ , आई आई आई निल निले-निले फूल निल नीला-नीली नदी साफ सरल निरमल गंगा से राधा रची ऊद सा जीवन रहे तुम्हारा रहु न रहू मैं तुम्हारा सात रंग में साथ रंगता तुम रंगरसियाँ रचती मैं इन्द्र सा धनुष बनता मैं तुम पर सोता तुम मुझ में खोती अब मैं मन मे रोता काश, तुम मुझ में होती मैं तुझ में होता जीवन का रस पान होता डर-मौत की ठंड है बाहर काश मैं तुझ में होता रैन तुम्हारी गर्मी में सोता भोर शिव मेरे पास होता कभी मेरी बाहो में सोता कभी तेरे आँचल में रोता सुकून सा मिलता है जैसे कोई काशी घाट हो जैसे दिल मे तेरे सो जाउ तैसे रंग में रस की महक है जैसे रस में मिला गुलाब है...