Story 2 "सरगम" -पियूष गुरुनानी मैं उसे रोज़ देखता था , पर हमारी कभी बात ही नही होती थी , होती थी तो सिर्फ संगीत में , मैं उसके लिए तानपुरा बजाता और वो गाती , उस में ही घुल जाता मैं । उसके पिता जी संगीत के महान गुरु थे , मैरे पास फीस के पैसे ना होने के कारण , मैं उनके घर के छोटे-मोटे काम कर देता । जी , हाँ हम एक ही छत के नीचे रहते थे , फिर भी बात नही होती थी , पर कभी कभी जब मैं उसके पास से गुजरता तो , तो आँखों का एक बार का मिलन हो ही जाता और मैं दिन भर यही सोचता रहता । वो उसके पिता जी के जैसी थी निर्मल , सहज और शांत , बस उस पर प्यार ज़्यादा आता है। मैंने एक दिन हिम्मत कर उसके लिए एक खत लिखा और उसका गोला बनाकर उसकी खिड़की में डालकर भाग गया 4 खत तो मैं युही फाड़ चुका था और जो दिया उसमे लिखा था कि - विणा , मैं अजय , मुझे तुम्हारा संगीत बहुत प्यारा लगता है और उससे भी ज़्यादा तुम मुझे प्यारी लगती हो । पर ना जाने क्यों घर मे हमारी कभी बात नही होती । अगर तुम्हें भी मैं पसंद हूँ तो आज शाम 7 बजे सीता घाट पर आ जाना "नीली चुन्नी" ओढ़े। मैं वहॉं 6 बजे ही पहुँच गया और सोचने ल...