"सरगम"
-पियूष गुरुनानी
मैं उसे रोज़ देखता था , पर हमारी कभी बात ही नही होती थी , होती थी तो सिर्फ संगीत में , मैं उसके लिए तानपुरा बजाता और वो गाती , उस में ही घुल जाता मैं ।
उसके पिता जी संगीत के महान गुरु थे , मैरे पास फीस के पैसे ना होने के कारण , मैं उनके घर के छोटे-मोटे काम कर देता । जी , हाँ हम एक ही छत के नीचे रहते थे , फिर भी बात नही होती थी , पर कभी कभी जब मैं उसके पास से गुजरता तो , तो आँखों का एक बार का मिलन हो ही जाता और मैं दिन भर यही सोचता रहता ।
वो उसके पिता जी के जैसी थी निर्मल , सहज और शांत , बस उस पर प्यार ज़्यादा आता है।
मैंने एक दिन हिम्मत कर उसके लिए एक खत लिखा और उसका गोला बनाकर उसकी खिड़की में डालकर भाग गया
4 खत तो मैं युही फाड़ चुका था और जो दिया उसमे लिखा था कि -
विणा ,
मैं अजय , मुझे तुम्हारा संगीत बहुत प्यारा लगता है और उससे भी ज़्यादा तुम मुझे प्यारी लगती हो । पर ना जाने क्यों घर मे हमारी कभी बात नही होती । अगर तुम्हें भी मैं पसंद हूँ तो आज शाम 7 बजे सीता घाट पर आ जाना "नीली चुन्नी" ओढ़े।
मैं वहॉं 6 बजे ही पहुँच गया और सोचने लगा कि अगर उसने गुरुजी को बता दिया तो? सोचते सोचते 6:50 हो गए और वो आ गई । शक्ल से तो गुस्से में थी , लगा जैसे आज तो शामत आई है । उसने कहाँ - "अगर बात करनी ही थी तो घर मे करते , पर तुमने कभी पहल की ही नही...
मैं डर गया... पर फिर धीरे धीरे हम बात करने लगे , वो घर से झूठ बोलकर आई कि सब्जी लेने जा रही है , और हम उसी घाट पर बैठ गए , वहाँ से शहर की बत्तियाँ चमकती दिखती , मानो तारे ज़मीन पर आ गए । मैं उसका हाथ पकड़े बैठा था कि कही वो गिर ना जाए , पर असल में ये एक बहाना था । जाने का वक्त हुआ । वो चल दी , मैं वही रुका रहा , मुझे लगा वो पलटेगी , पर मैंने देखा कि उसने... उसने नीले रंग की ही चुन्नी पहनी है और उसने मुझे पलट कर , मुझे पलट कर देखा , उसे मुस्कुराते देख । मानो दिल के सारे तार एक साथ छिड़ गए...
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