'Mini play' (1- 1:30 min)
लघु नाटक - लखंड़
- पियूष गुरुनानी
चूहा- सुनती हो मेरी डायन , मेरी भुतिनी...आज हमारी 25 वी सारगिरह है, मुबारक हो ।
भूतनी- जी , आपको भी मुबारक ।
चूहा- मुझे आज भी याद है... जब मैं इस घर मे खाना ढूंढने आ रहा था , मैरे दोस्तो ने मुझे बहुत टोका इस घर मे एक खूनी डायन रहती है , पर मैं था निडर , शेर की औलाद....तुम्हे देखते ही तुमहारे प्यार में डूब गया (खाँसने लगता है)
भूतनी- मुझे भी आप पर बहुत प्यार आया , इसलिए तो मैंने आपको अमर कर दिया , पर आप रहे छोटे के छोटे ही... (हसने लगती है)
चूहा - चुप कर , कुछ भी बक रही है...सोचा था तुझे आज खुश रखूंगा , पर तेरे लखण्ड नही है , प्यार से बात करने के...आज मजबूर मत कर कि आज भी मैं तुझे शराब पीकर पीटू... जा जाकर बरतन धो और चाय ला , मुझे चूहा संसद जाना है...जाती है या फुखु मंत्र...
भूतनी (करुण और भयभीत स्वर में ) - न..नह...नही जी , आज मुझे मत मारना...माफ करदेना जी , गलती हो गई जी (उड़कर चाय लेने जाती है)
चूहा - ये बीवियां भी ना , नाक में दम कर रखा है इससे अच्छा तो मैं कोई चुहिया रखेल ले आऊ... पर ये औरते होती ही अक्ल से पैदल है.....तू पड़ी रह यही , मैं जा रहा हूँ ... नही पीनी चाय , बाहर पी लूंगा..पता नही खुदको क्या समझती है हूँ...
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