कामचोर
-इस्मत चुगताई (कहानी)
-पियूष गुरुनानी (कविता)
वाद-विवाद चल रह था
हमारा सुस्ताना उन्हे खल रह था
नौकरो को बुझा कर दिया
हमको काम मे मखमोर कर दिया
बोला उठकर पानी पिलो
सिर्फ पानी पीकर चेन से जिलो
सबने मटका हाथ मे उठाया
कभी इधर से धक्का आया
कभी उधर से धक्का आया
अंत मे अम्मा ने हमे गिला पाया
फिर वो बोले
कामचोर कही के, ये तो कामचोर है
कामचोर कही के , ये तो कामचोर है
लगता है वो हमारे काम से खुश है
बोलिए-बोलिए और क्या-क्या काम है
बोलिए किस काम का क्या दाम है
पहले दरी उठाकर दौड़ लगाई
फिर करदी छड़ी से उसकी धुलाई
ईद आई, ईद आई
मगर खिर नही, धूरि आई
पिटाई लगाई गई
फिर झाड़ू पकड़ाई गई
थोड़ा पानी छिड़क लेना चाहिए...
अब गायब हो लेना चाहिए
मजदूर आंगन से मार-मार निकाले गए
बाल्टिया , लोटे , डोंगे-कटोरे लाए गए
हुआ था तय पेड़ो को पानी दिया जाए
नल एक था, सोचा, लोकतंत्र हो जाए
रिश्तेदारो को बुलाया गया
ईद का जश्न मनाया गया
छड़ियों से ऐसे सड़ाके लगाए
पर बड़ो की थी एक भुल,
वो हमे कैसे क्या करना है
लगता है बताना गए भुल
पर , पर , पर , पर
बोले...
कामचोर कही के , ये तो कामचोर है
कामचोर कही के , ये तो कामचोर है
हमे नहलाया गया
नौकरो ने किया बयाँ
हिस्से का 4 आना था गया
सोचा , मुर्गी को दाना डाला जाए
मगर ना सोचा, ना जाना था
मुर्गी को हमारे विरुद्ध भड़का रखा था
ईद आई , ईद आई
इस बार असली की
भेड़ो को खाना खिलाया जाए
पता नही वो कैसे
पूरे घर मे दौड़ लगा आए
सब ठीक किया गया
हमारा खाना बिक गया
भैस से दुध मंगा
भैस भगा
उसको हमने बांधा
लेकर चाचा की चारपाई का कांधा
भैस भागे
चाचा अजादी मांगे
खत्म हुआ ये खेल
हमे नही खेलना
चाहे कहलो
कामचोर कही के , ये तो कामचोर है
कामचोर कही के , ये तो कामचोर है
हाँ, हम कामचोर है
हम कामचोर है...
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