-यतीश कुमार (कहानी)
- पियूष गुरुनानी (कविता)
मै चलता हूँ
मै चलता हूँ
मेरे गाँव की ओर मे बड़ता हूँ
जो अब शहर हो गया..हूँ
जो, अब शहर हो गया
अरे , साईकिल से मोटर- साईकिल हो गया
साईकिल से मोटर- साईकिल हो गया
वो देखती है...
वो देखती है...
वो देखती है...
मुझसे पूंछ्ती है
कि सब ठीक हो गया था?
कि सब ठीक हो गया 'क्या'
उस डंडी पर मै चलता हूँ
उस डंडी पर मै चलता हूँ
जहाँ बचपन से मै पलता हूँ
उस नहर के बगल मे चलता हूँ
जो चिप्पक के डंडी के बहती थी
जहाँ हम भी एक पल बहते थे
जहाँ हम भी एक पल बहते थे
ऊपर से निचे
देखो, निचे से ऊपर
पर निचे से ऊपर मे होती थी कठिनाई
अरे, भईया होती थी कठिनाई
स्कुल तो थे 5 किलोमीटर दुर
खुलती जहाँ मुख्य सड़क मुड़
ना, हम उसे पेदल पार करते थे
हम उसे पेदल पार करते थे
चलते- चलते मिलते पोखर
चलते- चलते मिलते पोखर
उनमे थे, सिंघाड़े और बाकी फल..
हम वहाँ की मिट्टी लाते थे
हम वहाँ की मिट्टी लाते थे
जहाँ पे पानी था,
क्या था?
"पानी"
कहाँ?
ठीक बीचो-बिच
ठीक बीचो-बिच
पर अब फलखान की बारी थी
मगर सिंघाड़ो पर पहरे दारी थी
पप्पू था तेज़ बहुत
लाता सिंघाड़े,
तेल लगाकर बहुत
तेल लगाकर बहुत
जाता था वो नंगा
जाता था वो नंगा
एक बार पकड़ा गया...
सौ हो गया पंगा
मिन्नते मांगी ' बहुत'
मिन्नते मांगी 'बहुत'
बछ्कर हम आ गए
मगर , बचपन को कीड़ा था
क्या था?
"कीड़ा"
फिर से हम पहुंच गए
अरे भाई
, फिर से हम पहुंच गए
बनाई एक नाव
बनाई एक नाव
रात अंधेरे मे
रात अंधेरे मे
चुट-मुट तारो के निचे
चुट-मुट तारो के निचे
फिर खाँ-पीकर मस्त हो गए
कच्छे-गंजी बनियान भर गए
अब मूंछ वाला चौकीदार था
वो बड़ा होशियार था
हम स्कुल ना गए
चाहे भोर हो गई
हम 15 दिन वनवास पर गए...
पर पप्पू बड़ा हरामी था
पप्पू बड़ा हरामी था
अगले दिन गायब हो गया
उसकी माँ मेरे घर आई
उनकी सहेली थी मरी आई
उनकी सहेली थी मरी आई
सिर्फ हम निकले खोज पे
लेकर टॉर्च
लेकर टॉर्च
दिल था , थोड़ा डर गया
दिल था, थोड़ा डर गया
आसमान मे पुरा चाँद चड़ गया
चड़ गया
चड़ गया
चड़ गया
चड़ गया
थक हार कर मिला वो
पप्पू , पोखर के था बिच मे
बिच मे
बिच मे
बिच मे
बिच मे
उसी नाव मे
उसी नाव मे
हमने उसे बाहर निकाला
शरीर गया था उसका जम
धड़कने गई थी हमारी थम
हाथ सहलाए , आवाज लगाई
तब जाकर उठा , तब जाकर उठा
मै बेहद डर गया
मै बेहद डर गया...
-पियूष गुरुनानी
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